लात-घूसों से पीटे जा रहे सूअर: इंगलैण्ड के सूअर-फ़ार्म पर गुप्त जाँच में भयंकर अत्याचार का खुलासा
पशु-अधिकार संगठन एनिमल एक्वालिटी द्वारा हाल ही में लिए गये एक हृदयविदारक वीडियो में एक ब्रीटिश सूअर फ़ार्म पर सूअरों पर किए गये भयानक अत्याचार का खुलासा होता है।

ब्रिटेन के सबसे बड़े सूअर मांस उत्पादक के स्वामित्व वाले लिंकनशायर स्थित फिर ट्री फ़ार्म पर लगाये गये गुप्त कैमरों द्वारा वहाँ के कर्मचारियों द्वारा बार-बार सूअरों के चेहरों पर लात से मारने, उन्हें प्लास्टिक-बोर्ड से पीटने और कमजोर एवं रुग्न सूअरों को बिना किसी पशु-चिकित्सा के 48 घंटे तक छोड़ दिए जाने की दुःखद घटनाओं का खुलासा हुआ है।

यह तीसरी बार है जब इस संगठन ने ब्रिटिश फ़ार्म पर कर्मचारियों द्वारा निरीह पशुओं के साथ क्रूरतम दुर्व्यवहार की घटनाओं को रिकार्ड किया है।

एनिमल एक्वलिटी, इंग्लैण्ड के निदेशक डॉ. टोनी शेफ़र्ड ने कहा:

जबकि अधिकतर सूअर-फ़ार्म निहित रूप से निर्दयी स्थान होते हैं, इन बेचारे सूअरों पर की गयी बर्बरता समझ से बाहर है। वहाँ के कर्मचारी अपने अधीन पलने वाले पशुओं के प्रति पूर्णतः तिरस्कार का भाव रखते हैं और दर्द से कराहते सूअरों की दयनीयता से भी इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। हम माँग करते हैं कि उन्हें न्याय दिया जाए।

हृदयविदारक फ़ुटेज आप स्वयं देख लीजिए।


इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे दुनियाँ के किस हिस्से में हैं, फ़ैक्ट्री फ़ार्म कठोरतम दुर्व्यवहारों से भरे होते हैं। इस साल के शुरुआत में, इटली के पशु अधिकार संगठन Lega Anti Vivisezione द्वारा किए गए एक जाँच में सूअरों के गंदे बेड़े में रहने, संक्रमण एवं घावों की चिकित्सा के बिना पीड़ा में जीने को मजबूर, और उनकी पूँछ को गैर-कानूनी तरीके से काटे जाने की घटनाओं का पर्दाफ़ाश होता है। ये घटनाएँ पर्मा हैम को सूअर के मांस की आपूर्ति करने वाले छः इतालवी फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर दर्ज़ की गयी थी।

जैसा कि मर्सी फ़ोर एनिमल के जाँचों में निरंतर बताया गया है, पोर्क उद्योग में अत्याचार सामान्य रूप से चलता है।

सूअरों को दुनियाँ को पाँचवा सबसे बुद्धिमान प्राणी समझा जाता है। इनकी समझ कुत्तों से कहीं अधिक होती है। और कुत्ते एवं बिल्लियों की तरह सूअर भी सामाजिक एवं चुलबुले होते हैं। इसके बावजूद क्रूर मांस उद्योग इनके साथ महज एक वस्तु जैसा व्यवहार करता है।

खाने के लिए पाले जाने वाले सूअरों को महज दस दिन की उम्र में ही उनकी माँओं से अलग कर दिया जाता है। बिना किसी दर्दनिवारक के उनकी पूँछ को निर्दयतापूर्वक काट दिया जाता है, उनके दाँतों को तोड़ दिया जाता है एवं अत्यंत क्रूरतापूर्वक उनके अंडकोष को भी निकाल फेंका जाता है। बीमार और कमजोर सूअर-शावक जो तेजी से नहीं बढ़ते उन्हें कंक्रीट के फ़र्श पर सिर के बल पटककर बर्बरतापूर्वक मार दिया जाता है। जीवित सूअरों को भी उनके साथ ही गंदे बाड़े में ठूँस दिया जाता है।

यूँ तो सूअरों की प्राकृतिक आयु पन्द्रह वर्ष तक होती है, लेकिन फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर उन्हें इस प्रकार तेजी से बढ़ने के लिए नस्लीकृत किया जाता है कि वे महज छः महीने में ही मारे जाने लायक कद को प्राप्त कर लेते हैं। मादा सूअरों को बारंबार गर्भधारण करना पड़ता है और प्रसव-बाड़े एवं धातुओं के बने तंग पिंजरों में कैद रहना पड़ता है, जहाँ वे मुश्किल से मुड़ भी सकें।


एक अभिशप्त जीवन के बाद उन्हें उल्टा लटकाकर व गला काटकर क्रूरतापूर्वक मार दिया जाता है।


यदि हम कुत्ते और बिल्लियों के साथ ऐसा भयावह व्यवहार नहीं करते तो हम कैसे मांस उद्योग को सूअरों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करने दे सकते हैं? हम में से हर किसी के पास इतना सामर्थ्य है कि अन्तर्निहित क्रूरता से युक्त पशु उत्पादों को छोड़कर एवं करुणापूर्ण वनस्पतिक आहार अपनाकर पशु अत्याचार को नकार सकते हैं।

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