नये अध्ययन में चला पता: ठीक से ख्याल रखें तो मुर्गे होते हैं अधिक आशावादी
स्वीडन स्थित लिन्कोपिंग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किए गये एक अध्ययन में पाया गया है कि मुर्गे आशावादी या निराशावादी हो सकते हैं

साइंटिफ़िक रिपोर्ट्स पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में इस बात को स्थापित किया गया है कि तनावपूर्ण स्थिति मुर्गों की भावनात्मक स्थिरता को प्रभावित करते हैं। प्रसिद्ध विकासमूलक जीवविज्ञानी हेन्नी लोविले के नेतृत्व में अनुसंधानकर्ताओं ने व्यवहारात्मक एवं रासायनिक साधनों का उपयोग कर उपर्युक्त निष्कर्ष पर पहुँचे।

अनुसंधानकर्तानों ने पाया कि संकुल परिवेश में रहने वाले मुर्गे साधारण परिस्थितियों में रहने वाले मुर्गों की तुलना में अधिक आशावादी होने की संभावना रखते हैं।

अध्ययन का निष्कर्ष:

इस अध्ययन का परिणाम यह दर्शाता है कि बढ़ता हुआ तनाव घरेलू मुर्गे के व्यवहारों एवं मानसिक प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है और पर्यावरणीय संकुलता इन नकारात्मक प्रभावों के विरुद्ध प्रतिरोधक का काम कर सकती है। आगे, हमने दिखाया है कि छोटी मुर्गियों में डोपामाइन प्रक्रिया का संबंध निर्णय पूर्वाग्रह से है।

यह पहला अध्ययन नहीं है जिसमें दिखाया गया है कि मुर्गे-मुर्गियाँ एक समष्टीय प्राणी होते हैं। भविष्य की घटनाओं का अनुमान करना हो या छुपी हुई वस्तुओं के प्रक्षेप-पथ को याद रखना, मुर्गे-मुर्गियाँ बेहद ही चतुर होते हैं। उनमें आत्म-नियंत्रण एवं बेहतर आहार के लिए प्रतिक्षा करने जैसे गुण भी होते हैं। ये दोनों गुण स्वयंजागरुकता के लक्षण हैं

और अधिक कहें तो मुर्गे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ज्ञान हस्तांतरित करते हैं और वे न केवल अपने साथियों बल्कि लगभग एक सौ लोगों के चेहरे पहचान सकते हैं। वे तो यहाँ तक समझ सकते हैं कि कुछ देर पहले छुपाकर रखी गयी वस्तु अभी भी वहीं होगी। यह क्षमता मनुष्य के दो साल के बच्चों में नहीं होती।

मुर्गे दूसरों की परवाह करने वाले और संवेदनशील जीव होते हैं। जरा इस पर विचार कीजिए: मुर्गियाँ अंडा देने से पहले से ही अपने बच्चों से संवाद करना शुरु कर देती है। जबकि चूजे शेल के अंदर ही होते हैं, माँए उनके साथ हौले-हौले कुड़कुड़ाती है और प्रत्युत्तर में चूजे भी चहचहाते हैं।

हमारे घरों में रहने वाले कुत्ते एवं बिल्लियों की तरह मुर्गे-मुर्गियाँ आनंद, अकेलापन, कुण्ठा, भय और दर्द महसूस करते हैं।


दुर्भाग्यवश, मुर्गे-मुर्गियों के साथ इस पृथ्वी पर सबसे अधिक दुर्व्यवहार किया जाता है। वास्तव में, अमेरिका में खाने के लिए मारे जाने वाले प्राणियों में अस्सी प्रतिशत मुर्गे होते हैं और ये सबसे दयनीय जीवन जीते हैं। वे ऐसे बर्बर अत्याचारों के शिकार होते हैं जिसका हममें से कई लोग अनुमान भी नहीं लगा सकते।

मांस के लिए पाले जाने वाले मुर्गे-मुर्गियों को गंदे, तंग और अंधेरे पिंजरों में बंद कर रखा जाता है। इन्हें अप्राकृतिक रूप से बढ़ने के लिए नस्लीकृत किया जाता है। चिरस्थाई, असहनीय पीड़ा के शिकार ये मुर्गे-मुर्गियाँ कई बार अपने शरीर के भार तले दब कर ही गतिहीन हो जाते हैं। तीव्र वृद्धि के कारण उनके अनेक अंग काम करना बंद कर देते हैं।

वधशालाओं पर, इन निरीह प्राणियों को क्रूरतम ढंग से उल्टा लटका कर रखा जाता है, बिजली के दर्दनाक झटके दिए जाते हैं, और जीते जी गला काट कर मार दिया जाता है।


संयोग से, सुस्वादु एवं मानवीय वनस्पतिक व्यंजनों की प्रचुरता के कारण अब हर कोई अपने पसंदीदा स्वाद का मजा ले सकता है बिना किसी जीव को हानि पहुँचाए।

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